एक शेर है,
हज़ारों बार ज़माना इधर से गुज़रा है,
नई नई सी है तेरी रहगुज़र फिर भी
लोगों ने अपने माशूक के लिए इस शेर को कई बार कहा होगा, इश्क, रोमांस, उल्फत, स्नेह… अमूमन माशूक से जोड़े जाते हैं… या उस शहर से जिसमें माशूक रहता हो…
कोई दोस्त है न रक़ीब है
तेरा शहर कितना अजीब है…
लेकिन ज़रूरी नहीं रोमांस किसी इंसान से ही किया जाए… खुदा से किया जाए तो कोई मीरा सी दीवानी नज़र आती है… बच्चे से किया जाए तो यशोदा सी मां… मुझे इस शहर से इश्क है… ये शहर जो दिल्ली है… मैं इतिहासकार होता तो बता देता कि कैसे इंद्रप्रस्थ ने महाभारत की ऐतिहासिक लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई… या बता देता कि शहर के आखिर हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान का वक्त कैसा था… या कुतुबुद्दीन ऐबक ने क्या सोच कर इस्लाम की धुरी की तर्ज़ पर कुतुब मीनार तामीर की थी… अगर में इतिहासकार होता तो शायद बताता लोध, मंगोल, तैमूर, गुलाम, सूरी या यहां सबसे लम्बे अरसे तक राज करने वाले मुगलों नें दिल्ली को कैसे ढाला… दिल्ली की जिस बात ने मुझे आशिक बनाया है वो यही है… दिल्ली बार बार ढली है… लेकिन उसने अपनी शक्ल बदलने नहीं दी… सीमाएं वो नहीं जो कुछ सौ साल पहले थीं… लेकिन शहर वही है… जो दिल्ली आया… वो इसे बदल नहीं पाया सिर्फ अपनी निशानी छोड़ गया… कुतुब मीनार के पास लोहे का खंबा… मस्जिद, तुगलक का किला, हुमायूं का मकबरा… जितने बादशाह उतनी दिल्ली की पहचान…
कई दोस्त हैं जो दिल्ली को पसंद नहीं करते… मुंबई उनके लिए बेहतर है… उनसे कोई शिकायत नहीं… पसंद-नापसंद बेहद निजि मामला है… मुझे दिल्ली का मिजाज़ पसंद है… और अगर आप को शहरों की महक आती हो तो आप बता सकते हैं कि दिल्ली बाकी सभी शहरों से बिल्कुल अलग है… ये महक महसूस करने के लिए सर्दियों की सुबह इंडिया गेट के आस पास किसी सड़क पर खड़े होकर चाए पीजिए… या आप सुबह 7 बजे से पहले या रात 8 बजे के बाद पुरानी दिल्ली जाइए कोने में खड़े किसी कचौड़ी वाले से ज़ायका लीजिए ये खुश्बू वहां भी मिलेगी… हां, साउथ एक्सटेंशन, ग्रेटर कैलाश में आपको ये नहीं मिलेगी… क्योंकि इस खुश्बू के लिए कई सौ साल तक पकना पड़ता है… दिल्ली पक चुकी है… दिल्ली पक रही है… एक हल्की लौ में… जिसमें धीरे धीरे स्वाद बदलता है… दिल्ली का भी बदल रहा है… अभी और बदलेगा… जब मैं बुड्ढा हो जाउंगा तब तक ये स्वाद पूरी तरह बदल चुका होगा… लेकिन मुझे भरोसा है दिल्ली ऐसी ही रहेगी… न बेहतर होगी न बदतर… मिर्ज़ा गा़लिब को कोठे पर रहने वाली उस गुमनाम तवायफ के साथ दिल्ली से भी इश्क था… उन्हें भी शायद वो बीमारी थी जिसके थोड़े बहुत लक्षण मुझमें हीं… उन्होने लिखा था… और मैं गुनगुनाता हूं…
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ…
( photo courtesy Manu Sharma )

kya baat hai bhai ..bahut khub aur shukriya bahut bahut…meri photo ko izzat bakshne ke liye…:)
Bahot achchha post hai aur aaj kal jashni mahul main aur bhi achchha laga pad ke. Ibrahim Zauq (1789–1854) bhi ek baar rooth kar kahe
“था ज़ौक पहले दिल्ली में पंजाब का सा हुस्न
पर अब वो पानी कहते हैं मुल्तान बह गया”
wow sandeep, this is amazing… I guess 1850s was the best time for Delhi as Ghalib, Zaunk and Daagh Dehalavi all lived together on same area of Purani Dilli… loved it…
As bashir badr said
गुनगुनाता जा रहा था कोई
चले आना मेरी जान चांदनी चौक में…