श्रीसंत, हमको ग़ुस्सा क्यों आता है…

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श्रीसंत अच्छे हैं या ख़राब ये इस बात पर निर्भर करता है की आप क्रिकेट को किस लहजे से देखते हैं… आप टेस्ट पसंद करते हैं, वन-डे या ट्वेंटी-२० को… आपको कुरता पायजामा पसंद है या टी-शर्ट पसंद… आप कढ़ी चावल खाते हैं या बर्गर… खैर श्रीसंत सिर्फ़ एक खिलाड़ी नही हैं अब वो एक प्रतिनिधि हैं, वो प्रतिनिधि हैं आज की टीम इंडिया के… आज के उस नौजवान के जो किसी इंडस्ट्री में महारथ हासिल करने में नही बल्कि एक नई इंडस्ट्री बनने में यकीन रखता है… सबको याद है की साऊथ अफ्रीका में आंद्रे नेल की बौल पर छक्का मारने के बाद श्रीसंत ने क्या किया ठा…. लेकिन लोग ये भूल जाते हैं हैं की उस से पहले कितनी ही बार भारतीय खिलाडियों से कैसे पेश आया गया है… श्रीसंत ने तो केवल जवाब दिया ठा… लेकिन ये जवाब देने में भारतीय क्रिकेट को ७५ साल लग गए… क्या एंड्रू सायमंड से बहस आस्ट्रेलियन खिलाड़ियों और शायद भारतीय बोर्ड को अच्छी नही लगी… लेकिन क्या बोर्ड को गिलक्रिस्ट का व्यवहार अच्छा लगा ठा जो उन्होंने हरभजन से किया था… अगर उस पर कोई प्रतिक्रिया नही तो श्रीसंत पर क्यों? इंग्लॅण्ड दौरे पर श्रीसंत के बीमर की चर्चा हुई लेकिन पीटरसन के युवराज को गाली देने की बात मैच के बाद किसी ने नही की… ये दोहरा व्यवहार क्यों? सिर्फ़ इसलिए क्योंकि श्रीसंत बोअर्ड्स की नज़र में अभी स्तर नही हैं… या बोर्ड नही चाहता की उसकी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की उड़ान इतनी ज़्यादा हो जाए को बोर्ड की उसकी ज़रूरत होने लगे… ऐसा नही है कि श्रीसंत सिर्फ़ मीडिया में आने के लिए ऐसा करते हैं बल्कि वो लगातार बल्लेबाज़ को चुनौती देते हैं… वो मैच कस दौरान सहवाग को बे कह चुके हैं कि वीरू के चौके सिर्फ़ घरेलु मैच में क्यों नज़र आते हैं, इंटरनेशनल मैच में क्यों नही… वो सचिन तेंदुलकर को भी खेलते वक्त सिर्फ़ एक बल्लेबाज़ मानते हैं… माना वो अभी काफ़ी जूनियर हैं लेकिन क्या बॉलर सिर्फ़ बल्लेबाज़ के अनुभव को अपनी बौल की कसौटी माने? अगर ऐसा है तो दुनिया के किसी बॉलर को सचिन को आउट करने की कोशिश नही करनी चाहिए, ये सवाल तब क्यों नही उठते जब शोएब अख़्तर सचिन को वापस जाने का इशारा करते हैं… और अगर उनके लाइट खेल में जोश लाना ज़रूरी है तो श्रीसंत के लिए क्यों नही… क्यों उसके पर खुलने से पहले ही कतरने की कोशिश की जाती है…
 

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