अथ जूनियर कथा…

कमीनेपन की हद नहीं होता… क्योंकि अगर उसे हदों में बांधा जाए तो कमीनापन सिर्फ छिछोरापन बनकर रह जाता है। अक्सर आपने मीडिया समेत तमाम क्षेत्रों में सीनियर द्वारा जूनियरों को सताने के किस्से सुने होंगे। दोस्तों की महफिलों में ये चर्चा ज़रूर हुई होगी कि आखिर कैसे बॉस ने उसे या उसके साथ के एक बंदे को परेशान किया। कैसे सबके सामने उसको बेइज्ज़त किया। सीनियर जूनियर की ये मुहब्बत हज़ारों साल से बेतरतीब चली आ रही है। लेकिन शास्त्रों की मानें तो कलयुग आ गया और कलयुग में वो सब होगा जो पहले नहीं हुआ। ऐसे में सीनियर जूनियर का रिश्ता कलयुग से कैसे अछूता रहे। सो अब कुछ लोगों ने कलयुग की सत्यता साबित करने के लिए छिछोरेपन और कमीनेपन के बीच डोलते रहते हैं। बहरहाल बात कमीनेपन से निकलकर कलयुग तक आ गई तो यूं ही नहीं… बल्कि इन दिनों ये भी हो रहा है कि हमेशा सताई जाने वाली कौम जूनियर ने ठान ही है कि हज़ारों साल का बदला वो लेकर रहेंगे। और इसके लिए उन्होंने साम दाम दंड भेद जैसे पुराने पड़ चुके हथियारों के साथ ब्लैकमेल, बकैती औऱ असहयोग जैसे तुलनात्मक नए तरीकों को भी शालीनता से स्वीकार कर लिया है। सुनी सुनाई क्यों बीती बिताई की बात करें सो बात सिर्फ इत्ती सी थी कि दफ्तर में सिर्फ जवानी बिताने और दिखाने के मकसद से आए लोगों से प्यार से कह दिया प्लीज़ ये काम कर दो तो जैसे उनकी बनी बनाई इज़्ज़त तार तार हो गई। मैं और काम कर दूं… तो सीनियर क्या यहां भाड़ झ़ोंकने आएं हैं। काम ही करना होता तो यहां क्यों आते कुछ इसी तरह के और भाव चेहरे पर लिए जूनियर साहब ने कागज़ पकड़ा और पैर पटकते चले गए। बस वही मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। अगले ही दिन एक जूनियर का एसएमएस आया… तबियत खराब है नहीं आउंगा… दूसरे का फोन आया गांव से भाभी आईं हैं उन्हें फिल्म दिखाने ले जाना है। वो मेरी इजाज़त लेते तो मैं उनसे ऑफिस आने को कह भी देता। आदेशात्मक लहज़े में उन्होंने कहा मैं नहीं आउंगा आज सोचा आपको बता दूं। इस अहसान के बोझ तले मैं कम दबा बल्कि अंदाज़ से सहम और गया। लगा अगर छुट्टी को मना किया तो जिम वाले सारे दोस्तों को लाकर दो चार लगा ही न दे। और लगा दिया तो वेब साइट यही छापेंगी कि जूनियर को तंग करने वाला सीनियर बीच रास्ते में पिटा। बहरहाल बात वेब साइट की नहीं बल्कि लव-हेट रिलेशनशिप की हो रही थी। वेबसाइट का ज़िक्र इसलिए क्योंकि दहेज औऱ घरेलू हिंसा कानून की तरह वेबसाइट्स का भी गलत इस्तेमाल हो रहा है। औऱ अक्सर बिना सुनवाई के मीडिया ट्राइल के लिए इससे बढ़िया लैबोरेट्री और कोई नहीं। रात के तीन बजे मोबाइल में भले ही कोई मधुर सी रिंगटोन लगी हो डरावनी ही लगती है। ‘पत्रकारिता’ करने का एक साइड इफेक्ट ये भी है कि आपको मोबाइल ऑफ करने की इजाज़त नहीं, क्योंकि ये सर्वविदित है कि मौत और खबर कभी भी आ सकती है। औऱ आपको दोनों के लिए खुली बाहों और खुले मोबाइल से तैयार रहना चाहिए। ऐसे में रात तीन बजे के आस पास मोबाइल से साधारण तीन बजे ट्रिन ट्रिन की तान आई तो सोते सोते भी रुह कांप गई। फोन उठाते ही उधर से आवाज़ आई। सर सो रहे थे क्या… डिस्टर्ब तो नहीं किया। भूगोल औऱ प्राणी विज्ञान का ज़्यादा ज्ञान तो नहीं है लेकिन इतना पता है कि ज़्यादातर मैमल रात में सोते हैं। और मनुष्य तो खास कर। उसके बावजूद सभ्यता से जवाब देते हुए सीनियर को कहना पड़ा ‘नहीं नहीं बताओ क्या हुआ’ … जवाब आया… ‘हुआ क्या है बाथरूम में पानी नहीं आ रहा’… मुझे आज तक समझ नहीं आया कि क्या मैं उसके लिए ज़िम्मेदार था या नहीं। उसके बावजूद मैंने कहा कि हाउस कीपिंग या ऑफिस ब्वॉय को कह दो। तो उधर से आवाज़ आई ऊ तो हम बोल दिए हैं। हम सोचे कि आपको भी बता दें। अब इसमें भी एक इत्तेफाक है। ये शख्स उस शख्स के पक्के दोस्ते थे जिन्हें करीब 1 हफ्ते दो दिन पहले ही काम करने कह कर मैंने मानवाधिकार उल्लंघन किया था। उनकी बात सुनकर मैं थोड़ा नाराज़ भी हुआ लेकिन झुंझलाहट ज़ाहिर नहीं होने दी ये सोचकर कि कुछ कहूंगा तो ऑफिस पहुंचने से पहले ही एक मेल किसी वेबसाइट को चला जाएगा कि ये शख्स घर में रात को सोता है… किस्से कई हैं। ये सुसाइड नोट नहीं है जिसके बाद ज़िंदगी खत्म कर लूंगा। बात होती रहेगी। अब में दफ्तर आते ही सभी जूनियर को नमस्ते करने के बाद ही सीट पर बैठता हूं। ताकि इन जूनियर्स को वेब साइट्स को देने के लिए कम से कम एक मसाला तो न मिले। अलबत्ता मेरे नाम से कोई मेल आए तो उससे पहले इस पोस्ट को ज़रूर पढ़िएगा।

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