वरूणा से अस्सी…

अरे सर यहां तो मरते रहते हैं… लगता है यहां मरे तो स्वर्ग पक्का… उसकी बातों में मौत का गम नहीं था, जैसे मरना बनारस वालों के लिए ठीक वैसा ही है जैसे सांस लेना, अब क्या बताएं सर, हम रिक्शावाले हैं… साला हमें स्वर्ग जाना होता तो कीड़ों जैसे क्यों रेंगते। सीधे से शब्दों में जैसे उसे एक ही बार में हज़ारों साल पुराने उन तर्कों को झुठला दिया कि काशी में मरे तो मोक्ष मिलेगा, मैंने 50 रुपये में उसे पूरे दिन के लिए किया था कि बनारस घुमा दे… वैसे मुझे हिंदु धर्म, रीत, स्वर्ग, मोक्ष में नहीं किरदारों में दिलचस्पी है… किरदार जिनकी मैं फोटो उतार सकूं… पुराने शहरों में लोगों से ज़्यादा किरदार मिलते हैं… एक भिखारी जिसे पता है कि भगवान से बड़ा ब्रांड दुनिया में नहीं है… एक पानवाला जो किसी पेंटर की तरह कत्था-चूना लगाता है… एक चाटवाला जिसका अपनी दुकान में रखे पानी के बताशों से रिश्ता सा होता है, एक पंडा जिसे ये भरोसा है कि उसके हाथ से चंदन लगा तो सारे पाप कपूर बन कर उड़ जाएंगे… बड़े शहरों में भीड़ तो मिलती है किरदार नहीं मिलते… इन्हीं किरदारों की तलाश में बनारस आ गया… अरे हटो नहीं तो मर जाओगे.. जैसे ही रिक्शेवाले ने चिल्ला कर पैदल चलने वालों को हटाया जैसे मेरा ध्यान वापस आ गया… सर भूख लगी हो तो बता देना, कचौड़ी गली में बढ़िया लस्सी मिलती है… जैसे उसने बताना चाहा कि उसे भूख लगी है… मुझे भूख तो नहीं लगी थी लेकिन मैंने हामी भर दी… रिक्शा बाहर ही लगा गर मुझे वो गली के अंदर ले चला… एक दुकान के बाह खड़ा होकर मैं बनारस की पहेली जैसी गलियों को कैमरे में भरने लगा, तस्वीरें बोलती नहीं वरना गालियों की भी फोटो खींचता, बनारस जैसी गालियां कहीं नहीं सुनी…अरे सर थोड़ा बच कर, मेरी तरफ लपक कर उसने मेरा सर नीचे कर दिया, वो न करता तो पीछे से आती अर्थी मुझसे टकरा जाती… खाने पीने की गली में अर्थी देखकर मैं थोड़ा चौंक गया.. लेकिन वो और उसके जैसे सभी बाकी को कोई फर्क नहीं… कोई और शहर होता तो लोग अदब से खड़े हो जाते सर पर हाथ रख लेते, मैंने जैसे ही सर पर हाथ रखा वो हंसने लगा… अरे सर यहां ऐसे हाथ सर पर रखोगे तो खांस भी नहीं पाओगे… मौत और बेफिक्री… पहली बार साथ देख रहा था… कभी ये नज़ारा नहीं देखा था… फोटो तो खींची लेकिन उस अहसास को फोटो में भर नहीं सका… जैसे मैं एक बच्चा था, जो बड़े से मेले में आ गया था, और मेरे चारों तरफ इतने तमाशे हो रहे थे कि मैं समझ ही नहीं पाया कि किस तरफ देखूं किस तरफ को छोड़ूं… बनारस की सुबह और शाम के बीच फंसा मैं ये सोच रहा था कि ये इतनी मौत के बावजूद यहां किसी को गम नहीं… रिक्शेवाला मुझे उसी खाने-पीने वाली गली में आगे ले चला… सर ये मणिकर्णिका घाट है… इसकी कहानी तो नहीं पता, किताब में पढ़ लेना लेकिन ये सारे मुर्दे यहीं फूंके जाते हैं… कई तो साले अपने मां-बाप को यहीं छोड़ कर फरार हो जाते हैं.. जब बूढे बुढ़िया मरते हैं तो बेटा सोचता होगा कि मोक्ष मिल गया… साला किसे पता मुक्ति मिली या कुत्ते ने खा लिया… मैं उसकी बातों को अनसुना करके फोटो खींचने लगा… चिताएं, मुंडन, स्नान, पंछी, नाव, मंदिर काशी के घाट नहीं जैसे एक मॉल हो जहां धर्म से जुड़ा हर काम होता है… मैं नाव में बैठ कर दूसरी तरफ जाने की सोच ही रहा था कि जैसे वो फिर मेरे सामने कूद पड़ा… हरामी हैं साले नाव वाले 200 से एक रुपया ज़्यादा मत देना सर, अब 200 तो बनता है बेचारा इतने हाथ पांव मारेगा… मैं नाव में बैठ कर फोटो खींचने लगा और वो मल्लाह से पता नहीं क्या बात कर रहा था… कितना बोलता है ये रिक्शेवाला… दो मिनट चुप हो जाए तो मैं शांति से अपना काम करूं… मैंने खुद को मीठा बनाते हुए कहा… यार दो मिनट चुप हो जाओ मैं थोड़ा काम कर लूं… उसके चेहरे से ज़ाहिर था कि उसे ये बात अच्छी नहीं लगी… उसके बाद वो कुछ नहीं बोला… शाम तक मेरे साथ रहा लेकिन कुछ खास बोला नहीं… बीच बीच में कुछ बड़बड़ाता लेकिन जैसे उसे ध्यान हो जाता कि मुझे ज़्यादा बोलना पसंद नहीं तो चुप हो जाता… शाम को दशाश्वमेघ घाट के पास मुझे छोड़ते हुए बोला… सर कल भी बनारस घूमना हो तो बता देना.. मैं होटल आ जाउंगा… कुछ बोलूंगा नहीं… आपको एक ऐसी चीज़ खिलाउंगा जो सिर्फ सर्दियों में मिलती है.. लेकिन मैं जैसे इस रिश्ते को बढ़ाना नहीं चाहता था.. मैंने कहा.. नहीं कल ज़रूरत नहीं है… वो मुंह लटकाए चला गया… होगा कोई मुझे क्या… शाम को मैंने गंगा आरती की तस्वीरें लीं… रौशनी… धर्म… अध्यात्म… वो जैसे कोई और दुनिया थी… वहां देखकर लगता ही नहीं था कि थोड़ी ही दूर ऐसी ही आग चिताओं को जला रही है… ये मेल दुनिया में कहीं नहीं था… मौत का अंधेरा और पूजा की चकाचौंध… तस्वीरें लेकर मैं लौट आया… रात को होटल में मैं सोच रहा था कि एक बार फिर मणिकर्णिका घाट जाना चाहिए… सुना है वहां उसी अग्नि से चिता को मुखाग्नि दी जाती है जो हज़ारों साल से जल रही है… इस बार कचौड़ी गली में मैंने हर चीज़ का स्वाद भी चखा, कचौड़ी, लस्सी औऱ हर वो चीज़ जिसके बारे में इंटरनेट पर लिखा था… लेकिन आज वो बक बक नहीं थी तो राहत मिली… अर्थियां मेरे पास से गुज़र रहीं थीं और खुद को बेफिक्र दिखाने का नाटक करता मैं घूम रहा था… आज शांति लग रही थी… अच्छा लग रहा था…राम नाम सत्य है… बीच बीच में सुनाई देता मैं कभी सुनता कभी अनसुना कर देता… इधर उधर मंदिरों की फोटो खींचते खींचते जैसे ही घाट पर पहुंचा शांति सन्नाटे में बदल गई… टूटी फूटी अर्थी पर उसी रिक्शेवाले की लाश पड़ी थी… मैं पसीना पसीना हो गया… पास खड़े एक आदमी से पूछा तो उसने बताया कोई ट्रक रात को टक्कर मार गया… उसकी आवाज़ जैसे मेरे मन में गूंजी… मोक्ष मिलना होता तो कीड़ों जैसे पैदा क्यों होते… मैं तुरंत पलट कर वहां से निकल गया… सीधा होटल रुका आ कर… सिर्फ एक बात मन में आई… काश काशी में सबको मोक्ष मिलता हो…

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5 Comments

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5 responses to “वरूणा से अस्सी…

  1. Mukesh

    मोहित,
    बहुत अच्छा ऑब्जर्वेशन, बेहद दिलचस्प अंदाज और गंगा से प्रवाह वाली भाषा,,,,
    बहुत अच्छा।

  2. बहुत ख़ूब मोहित… अपने अंदर छुपे लेखक को बड़ा बनाओ… सिर्फ ब्लॉग से काम नहीं चलेगा दोस्त….

  3. Madhurendra sinha

    Great Mohit! What life means in Hindus’ most religious place, you have explained in few words.Maut Ka sannata aur Puja ki chakachoundh- fabulous lines!

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