पूड़ी…

ऐ बुढ़िया… दिखाई नहीं देता… रणछोड़ चीखा… भीड़ भरी सड़क पर किसी विधवा आश्रम से निकली वो बुढ़िया सहम कर वहीं ठिठक गई… न सड़क के पार गई और न ही वापस जा पाई… नई मोटरसाइकिल में रणछोड़ ने ब्रेक लगाया तो वो सफेद कपड़ों वाली बाल कटवाए हुए बुढ़िया के पास जाकर रुक गई… क्या री अम्मा… तेरे को दिखाई नहीं देता सड़क कैसे पार करते हैं… बुढ़िया अचानक सामने आई मोटरसाइकिल… उसके ब्रेक की तेज़ आवाज़ और रणछोड़ के चिल्लाने से जैसे छोटे से कोमा में चली गई हो… अरे यार… यहां विधवाएं इतनी बढ़ गईं हैं कि पत्थर भी फेंको तो कम से कम दो बुढ्डियों के लगेगा… तुम विदेश से आए हो ना… तुम्हें तो पता होगा… वहां भी तो होता है ना ओल्ड ऐज होम… रिटायरमेंट होम कहते हैं वहां पर.. मैंने बात काट कर कहा.. अरे यार… गुलाब को गुलाब नहीं कहेगा… शेक्सपियर का सदियों पुराना जुमला सुनाते सुनाते वो हंसने लगा… मुझे समझ नहीं आया कि मैं हंसूं या नहीं… मेरे सामने उसी बुढ़िया की शक्ल घूम रही थी… किसने छोड़ा होगा उसे… उसके बच्चे होंगे या नहीं… विधवा होने के पाप में उसकी कितनी हिस्सेदारी होगी… रणछोड़ ने बाइक रोकी और कहा.. सुन तेरे को लस्सी पिलाता हूं… कल्लू की दुकान पर कल्लू तो मर गया उसका लौंडा बनाता है… साला इंडिया से ज़्यादा विदेश में मशहूर है.. इंटरनेट पर छाया रहता है… कोई तो बोल रहा था कि विदेश में दुकान भी खोलना चाहता है… रणछोड़ और भी न जाने क्या क्या बोल रहा था… लेकिन मैं उस बुढ़िया से आगे ही नहीं बढ़ पाया… कांपती… छोटी सी… तन पर बंधी सफेद साड़ी का सिरा सर पर भी था… दुनिया ने भले ही उसे छोड़ दिया हो वो दुनिया को नहीं छोड़ पाई थी शायद… झोला खाली था… मंडी के बाहर ही थी… गरीब तो थी ही भूखी भी थी… वरना ऐसे कांप कांप कर कोई नहीं चलता… मैं जैसे उस लम्हे से बाहर ही नहीं निकल पा रहा था… और रणछोड़ ने कब मुझे लस्सी का ग्लास थमा दिया पता ही नहीं चला… रणछोड़… कृष्ण का ही नाम… मथुरा में हर शख्स.. हर चीज़ जैसे कृष्ण से जुड़ी हुई थी… कृष्ण…यहीं उन्हें दूसरी मां का प्यार मिला जिसकी मिसाल आज तक दुनिया देती है…शायद उस बुढ़िया ने भी अपने बेटे को वैसा ही प्यार दिया होगा… या शायद नहीं… उलझन थी कोई मां से कैसे ऐसा कर सकता है… रणछोड़ से शिकायत नहीं थी… वो उसकी मां तो थी नहीं… सो जानवर जैसा व्यवहार किया भी तो क्या… अचानक रणछोड़ चिल्लाया… अरे वो पूड़ी निकाल जल्दी से जो अम्मा ने दी थी… गऊ माता वो रही.. न जाने गाय कहां गईं आज कल.. अच्छा है यहीं मिल गईं वरना कितना घूमना पड़ता… जय गऊ माता कहते कहते उसने सारी पूड़ियां गाय को खिला दीं… बस एक नीचे गिर गई…मैंने दुआ मांगी काश वो बुढ़िया भी इधर होती तो अपने हिस्सा का पुण्य मैं भी बटोर लेता…

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