बाज़ीगरी, हार का दूसरा रूप…

शब्दों की बाज़ीगरी भी हाथ की सफ़ाई जैसी ही तो है… देखने वाला वो देखता है जो आप दिखाते हैं… जितना चालाक दर्शक उतनी ही मज़ेदार हाथ की सफ़ाई भी होती है… मज़ा इसी में है… देखने वाले के दिमाग को हर कदम पर पटखनी दी जाए… पटखनी… हमले के लिए भी और बचाव के लिए भी… लिखना भी ऐसी ही हाथ की सफ़ाई है… आपको पढ़ने वाला अगर जुड़ जाए तो आपके शब्दों में अपनी ज़िंदगी देखने लगता है… और आप उसके दिमाग से खेलने लगते हैं…किसी सड़क किनारे खड़े बाज़ीगर की तरह जो अपने शब्द रूपी जमूरों के सहारे जादू देखने वालों को उलझाता है… बहलाता है… और वही दिखाता है जो वो खुद दिखाना चाहता है…

 

कहना बहुत आसान है कि हार नहीं माननी चाहिए… लेकिन सवाल है क्यों नहीं माननी चाहिए… गाहे बगाहे ऐसा कुछ हो ही जाता है जो अपनी हार से रू-ब-रू हो जाता हूं… कभी दूर से… कभी बिल्कुल आंखों के आगे… माज़ी अनजाना… मुंह चिढ़ाता… बिना देखे निकल जाता है… और मैं रेत की तरह बिखर जाता हूं… फिर बाज़ार में बिकने वाली बैंड ऐड लगा कर अपने ज़ख्मों को सजा लेता हूं… ज़ख्म छुप भले ही जाए… लेकिन दर्द तो देता ही है… हल्का हल्का… मीठा दर्द नहीं… कड़वा… शिकस्त वाला दर्द… फिर थोड़ी देर बाद बैठ जाता हूं… बाज़ीगरी का कोई खेल दिखाने… कंप्यूटर उठाता हूं… लिख देता हूं कुछ… कुछ कहते हैं कि अच्छा लिख लेता हूं… असल में मैं उतना ही अच्छा लिख पाता हूं जितना बुरी तरह टूट जाता हूं… अक्सर… गाहे बगाहे… मेरी बाज़ीगरी लोगों को मज़ा देती है… वो इसमें अपनी कहानी ढूंढ लेते हैं… जब खुद को उससे जोड़ लेते हैं तो कहते हैं लड़का बाज़ीगर है… लेकिन असल में मैं अपनी हार के ज़ख्म पर कोई चमकीली बैंड ऐड लगा रहा होता हूं…

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