बयानों के बाज़ार की डिमांड सप्लाई, और राहल का नया बाज़ार

मांग और पूर्ति खुले बाज़ार का बुनियादी सिद्धांत है, जितनी ज़्यादा मांग होती है… सामान की कीमत और मात्रा उतनी बढ़ती जाती है… जितनी ज़्यादा मात्रा होती है, बाज़ार उतना ही बढ़ता जाता है… बाज़ार जितना बढ़ता जाता है सप्लाई भी उतनी ही बढ़ती जाती है… मांग भले ही न बढ़े लेकिन मात्रा काफी ज़्यादा हो जाती है… लेकिन इस बात का राजनीति से क्या रिश्ता है… सीधे तौर पर तो नहीं दिखता लेकिन राजनीति इस वक्त भारत में खपाई जाने वाली सबसे बड़ी चीज़ बन चुकी है, अखबार, चैनल्स और अनगिनत वेबसाइट के अलावा राजनैतिक चर्चा जितनी बड़ी मात्रा में अब नज़र आ रही है पहले ऐसी नहीं थी… पहले तो भारतीय वोटर्स को उदासीन तक मान लिया जाता था… 2009 के आम चुनाव काफी हद तक उदासीन वोटर्स ने ही तय किया था… लेकिन 2011 के बाद राजनीति एक तरह fmcg उत्पाद की तरह बढ़ी है… भारतीय मिडिल क्लास ने राजनीति और मुद्दों को इस्तेमाल ठीक वैसे ही किया है जैसा वो साबुन खरीदते वक्त करते हैं… ब्रांड अब नेता बनने और चुने जाने के लिए सबसे अहम चीज़ बन गया… जैसा कि अर्थव्यवस्था में होता है ज़्यादा डिमांड की वजह से सप्लाई की मात्रा भी तेज़ी से बढ़ी… इसी दौरान सस्ते नारों और बयानों की भी बाढ़ आई… बाज़ार के सिद्धांत के मुताबिक है सस्ते, मसालेदार बयान देने वाले नेता ज़्यादा डिमांड में आ गए… और एक तरह से इन नेताओं ने पूरे बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया… जितना मसालेदार बयान उतनी ही उसकी खपत… राजनीति और अर्थव्यवस्था का ये जोड़ बेहद दिलचस्प रहा… लेकिन बाज़ार के साथ एक दिक्कत जुड़ी होती है…. जैसे जैसे मांग और सप्लाई बढ़ती है चीज़ों की कीमत बहुत गिर जाती है… और जब कीमत बहुत ज़्यादा गिर जाती है तो वस्तु की क्वालिटी पर सीधा असर पड़ता है… आप थोड़ा सा भी ज़ोर लगाएंगे तो समझ आ जाएगा कि खराब क्वालिटी के नेता और बयान किस तरह राजनीति के बाज़ार पर छा गए… इसका सबसे बड़ा नुकसान राहुल गांधी और कांग्रेस को हुआ… उनके बाज़ार को काफी तेज़ी से सस्ते बयानों ने अपने हिस्से में ले लिया…

 

राहुल गांधी जब सक्रिय राजनीत में शुरूआत कर रहे थे तो वो खुद को एंग्री यंग मैन के तौर पर पाते थे… 2007 के पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनावों में उनके भाषण हाव-भाव गुस्सेवाले नौजवान के तौर पर ही नज़र आते थे… लेकिन राहुल इस नए बाज़ार को बनाते वक्त एक बात भूल गए कि दूसरी पार्टियों ने इस तरफ ज़्यादा ध्यान दिया और उसे हथिया लिया… ठीक उसी तरह जैसे माइक्रोसॉफ्ट ने मोबाइल, क्लाउड कंप्यूटिंग की शुरूआत की लेकिन फायदा एंड्रॉयड और एप्पल ने उठाया… धीरे-धीरे पूरा बाज़ार ही राहुल के हाथ से फिसल गया… माइक्रोसॉफ्ट और राहुल की हालात किसी से छुपी नहीं है… मसालेदार बयान-नारे बीजेपी ज़्यादा अच्छे दे रही थी… औरaggressive market पर कब्ज़ा करने के लिए अरविंद केजरीवाल आ गए… यानी जो बाज़ार राहुल बनाने की कोशिश कर रहे थे वो आकार में आने से पहले ही कांग्रेस के साथ से छटक गए

 

पिछले कुछ वक्त को ध्यान से देखें तो लगता है कि राहुल ने अर्थशास्त्र की दूसरी रणनीति अपना ली है… राहुल के ट्वीट में अब गुस्सा कम नज़र आ रहा है… तल्खी की जगह तंज़ ने ले ली है… ऐसा लग रहा है कि वो अपनी छवि आक्रामकता से हटा कर हल्के फुल्के कम गंभीर और युवा नेता के तौर पर करना चाहते हैं… अर्थव्यवस्था की हालत पर अरूण जेटली पर किया गया उनका ट्वीट काफी चर्चा में रहा… इसमें वो आर्थिक हालत से गुस्सा नहीं बल्कि तंज़िया तौर पर उस पर टिप्पणी करते नज़र आए… तो क्या राहुल ने राजनीति के अर्थशास्त्र में अपना अलग बाज़ार बनाना शुरू कर दिया है… आक्रामक बयान देने वाले बहुत से नेता बाज़ार में हैं… सप्लाई मांग से ज़्यादा हो गई है… क्या राहुल को लगने लगा है कि अब ग्राहक ( वोटर ) नए उत्पाद की तलाश में है क्योंकि पुराने उत्पादों की उम्र पूरी हो गई है… आर्थशास्त्र के मुताबिक हर उत्पाद की एक कीमत और उम्र होती है… लेकिन क्या आक्रामक राष्ट्रवाद का बाज़ार मंदा पड़ रहा है… राहुल की भाव भंगिमा को देखें तो लग यही रहा है कि वो कांग्रेस के पुराने बाज़ार को बदलना चाहते हैं… वो एक नई डिमांड-सप्लाई शुरू करना चाहते हैं क्योंकि पुराने बाज़ार में उनका माल कोई नहीं खरीदेगा… और बाज़ार का एक सार्व भौमिक नियम है… कि वो कभी गलत नहीं होता….

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