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बड़ा दरख़्त

fictional account of an unknown Indian who was invited for a revolution… दोपहर खाने के बाद से ही वो वहां बैठा था… जून है… लेकिन न जाने कहां से थोड़े से बादलों ने आ कर मौसम थोड़ा बेहतर कर दिया… सिर्फ इतना बेहतर कि अपने खेत में बैठे तो धरती पैर नहीं जला रही आज… वैसे तो जून की तपिश ने बहुतों को झुलसा दिया है… आज बिना बात के ही काफी कुछ याद आ रहा था… खेत में पानी दे रहे इंजन की आवज़ जैसे रेलगाड़ी बन कर 30 साल पहले ले गई… 5-6 लड़के आए थे गांव में… कपड़े के जूते पहने थे… हाथ में सैतालीस थी… आंखों में खून… हमारे तखत पर हमला किया है उन्होंने… छोड़ेंगे नहीं… चलो दरबार साहिब ने बुलाया है… आवाज़ में शेरों जैसा ज़ोर… हाथ की नसें तनी हुईं… पसीने और मिट्टी से लथपथ… गांव आए थे… नौजवानों के हाथों कौम को बचाने… कई लड़के खड़े हो गए… कुछ के मां बाप ने उन्हें भेजा… कौम गांव की गलियों के रास्ते अपने आप को बचाने निकल रही थी… वो उस दिन भी नहीं हिला… मूरत की तरह बैठा रहा… जोशीले भाषण… कौम के मिटने का खौफ पैदा कर रहे थे… बीच बीच में कोई बोले सो निहाल कह देता तो पंजाब के अंदर कहीं बसा उसका गांव जैसे हरमिंदर साहब से जुड़ जाता… वो उस दिन भी खामोश था… भाप्पा… लल्ली… सिंटो चले गए थे.. कुछ ने उसे दुत्कारा भी… बुज़दिल कहा… नकली सिख.. हिंदुओं का मुसलमानों का कुत्ता कहा… लेकिन उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे… आज भी समझ नहीं आ रहा… रेडियो पर खबर आ रही थी कि ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी में हरमिंदर साहब में दो गुट लड़ गए… कुछ घायल हुए… वो आज भी यही सोच रहा था कि इस बार भी लड़ाई कौम की है या कमाई की…

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