Hear Boys too

scream girls should hear

in the wake of gruesome Delhi rape, it’s equally shameful to every man of Delhi but…. there is a big BUT here…. (please note there is only one ‘T’ here…) every man is not rapist, every delhi boy is not molester, and every local boy is not running after chicks for some clicks, here are few points by a Delhi boy

1. We ‘Hate’ rape as much as you do, even more because even a single case paints all of us Black

2. We do not and will not rape, because either we have a girl friend/wife or we are of no use

3. We are equally scared of going out late night, because there are more number of murders by strangers than rapes

4. We HATE Rape ( repetition intended )

5. Girls have right to dress the way they want, they have responsibility to carry their dress too

6.  If we are looking at you we might actually be honestly praising your beauty, or your earring, or your bindi, to gift similar to our sister/mother/gf. There is nothing wrong in that

7. If four boys are standing and laughing they might be cracking joke on their school teacers, it’s not necessary that they are ‘eve teasing’ you.

8. WE HATE RAPE

9. We too only go out for late night movies when we are sure of transportation… Auto-wallah’s have tried looting us too.

10. the MALE friend was also beaten ( almost to death ) by the rapists

11.  The Rapists were not actually from Delhi, they came from outside and were not educated

12. We too want liberty to roam on roads freely at any point of time, but sometimes police is nicer to girls than to boys ( atleast they don’t slap you before asking where are you coming from )

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It’s not about Rape, it’s about reaction

 

Since past few months, India seems to be engages in a new game, ‘weekend protest game’ recent ‘spontaneous protest’ at Vijay Chowk seems to be the new playground for this, earlier Jantar Mantar was the favourite pitch for the same. First there is NOTHING wrong in protests, infact India was too sleepy about it till recently, Anna-Arvind sold the concept of ‘Mango Man’ protest to the country, a concept which was ignored by almost every political party and leader. 

Coming back to the Vijay Chowk protest, there is more to what we see and emotionally feel, we might be looking hard to search for our own ‘Tehrir Chowk’ in Jantar Mantar, Ramlila Maidan or now Vijay Chowk, we are forgetting a crucial link, and that link is weekend connection. the gruesome rape happened on Sunday night, till thursday all the accused were arrested, but in the meanwhile the demand for harshest punishment was already wild, but again, what prompted people to gather and protest on Vijay Chowk? while few hundred meters away stands India Gate which too has become symbol of standing up for the rights, Saturday marked first weekend after the incident, and since Anna movement it’s a trend to ‘join’ protest on empty weekends, we might have become weekend protesting city unknowingly, the difference between Tehrir Square and Delhi remains that in Tehrir Square people gathered day and night, from around the world for a cause, while in the Delhi, which in many year’s failed to keep the very basic nature of Delhi, the culture is becoming hypocritical. No government, no social group, or even no school ever told school kids about the culture of Delhi, which deteriorated with time time. 

 Delhi, the ‘Power Capital’ of India is News Capital too, and as an insider I can say News Channel is a hungry Giant, it needs to be fed every moment, and incident like this sometimes ensure uninterrupted supply of ‘Food’ to run the giant, sometimes it’s cricket, politics, and sometimes it’s rape. The engines of Indian society ( Politicians, Bureaucrats and Police too) takes these  incidents as Storm Sandy which creates terror but passes eventually.

 

I personally believe there is enough laws in India, and we do not need any new law, all we need to is to respect and follow the existing laws first, be it traffic laws or more serious offences, and I guess it’s time to seek answers during elections, because clicking on ‘Online Petitions’ will do nothing but fill email inbox and facebook timelines, if the problem is real lets try and find the real answers.

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पूड़ी…

ऐ बुढ़िया… दिखाई नहीं देता… रणछोड़ चीखा… भीड़ भरी सड़क पर किसी विधवा आश्रम से निकली वो बुढ़िया सहम कर वहीं ठिठक गई… न सड़क के पार गई और न ही वापस जा पाई… नई मोटरसाइकिल में रणछोड़ ने ब्रेक लगाया तो वो सफेद कपड़ों वाली बाल कटवाए हुए बुढ़िया के पास जाकर रुक गई… क्या री अम्मा… तेरे को दिखाई नहीं देता सड़क कैसे पार करते हैं… बुढ़िया अचानक सामने आई मोटरसाइकिल… उसके ब्रेक की तेज़ आवाज़ और रणछोड़ के चिल्लाने से जैसे छोटे से कोमा में चली गई हो… अरे यार… यहां विधवाएं इतनी बढ़ गईं हैं कि पत्थर भी फेंको तो कम से कम दो बुढ्डियों के लगेगा… तुम विदेश से आए हो ना… तुम्हें तो पता होगा… वहां भी तो होता है ना ओल्ड ऐज होम… रिटायरमेंट होम कहते हैं वहां पर.. मैंने बात काट कर कहा.. अरे यार… गुलाब को गुलाब नहीं कहेगा… शेक्सपियर का सदियों पुराना जुमला सुनाते सुनाते वो हंसने लगा… मुझे समझ नहीं आया कि मैं हंसूं या नहीं… मेरे सामने उसी बुढ़िया की शक्ल घूम रही थी… किसने छोड़ा होगा उसे… उसके बच्चे होंगे या नहीं… विधवा होने के पाप में उसकी कितनी हिस्सेदारी होगी… रणछोड़ ने बाइक रोकी और कहा.. सुन तेरे को लस्सी पिलाता हूं… कल्लू की दुकान पर कल्लू तो मर गया उसका लौंडा बनाता है… साला इंडिया से ज़्यादा विदेश में मशहूर है.. इंटरनेट पर छाया रहता है… कोई तो बोल रहा था कि विदेश में दुकान भी खोलना चाहता है… रणछोड़ और भी न जाने क्या क्या बोल रहा था… लेकिन मैं उस बुढ़िया से आगे ही नहीं बढ़ पाया… कांपती… छोटी सी… तन पर बंधी सफेद साड़ी का सिरा सर पर भी था… दुनिया ने भले ही उसे छोड़ दिया हो वो दुनिया को नहीं छोड़ पाई थी शायद… झोला खाली था… मंडी के बाहर ही थी… गरीब तो थी ही भूखी भी थी… वरना ऐसे कांप कांप कर कोई नहीं चलता… मैं जैसे उस लम्हे से बाहर ही नहीं निकल पा रहा था… और रणछोड़ ने कब मुझे लस्सी का ग्लास थमा दिया पता ही नहीं चला… रणछोड़… कृष्ण का ही नाम… मथुरा में हर शख्स.. हर चीज़ जैसे कृष्ण से जुड़ी हुई थी… कृष्ण…यहीं उन्हें दूसरी मां का प्यार मिला जिसकी मिसाल आज तक दुनिया देती है…शायद उस बुढ़िया ने भी अपने बेटे को वैसा ही प्यार दिया होगा… या शायद नहीं… उलझन थी कोई मां से कैसे ऐसा कर सकता है… रणछोड़ से शिकायत नहीं थी… वो उसकी मां तो थी नहीं… सो जानवर जैसा व्यवहार किया भी तो क्या… अचानक रणछोड़ चिल्लाया… अरे वो पूड़ी निकाल जल्दी से जो अम्मा ने दी थी… गऊ माता वो रही.. न जाने गाय कहां गईं आज कल.. अच्छा है यहीं मिल गईं वरना कितना घूमना पड़ता… जय गऊ माता कहते कहते उसने सारी पूड़ियां गाय को खिला दीं… बस एक नीचे गिर गई…मैंने दुआ मांगी काश वो बुढ़िया भी इधर होती तो अपने हिस्सा का पुण्य मैं भी बटोर लेता…

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Dilli se…

एक शेर है,

हज़ारों बार ज़माना इधर से गुज़रा है,

नई नई सी है तेरी रहगुज़र फिर भी

लोगों ने अपने माशूक के लिए इस शेर को कई बार कहा होगा, इश्क, रोमांस, उल्फत, स्नेह… अमूमन माशूक से जोड़े जाते हैं… या उस शहर से जिसमें माशूक रहता हो…

कोई दोस्त है न रक़ीब है

तेरा शहर कितना अजीब है…

लेकिन ज़रूरी नहीं रोमांस किसी इंसान से ही किया जाए… खुदा से किया जाए तो कोई मीरा सी दीवानी नज़र आती है… बच्चे से किया जाए तो यशोदा सी मां… मुझे इस शहर से इश्क है… ये शहर जो दिल्ली है… मैं इतिहासकार होता तो बता देता कि कैसे इंद्रप्रस्थ ने महाभारत की ऐतिहासिक लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई… या बता देता कि शहर के आखिर हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान का वक्त कैसा था… या कुतुबुद्दीन ऐबक ने क्या सोच कर इस्लाम की धुरी की तर्ज़ पर कुतुब मीनार तामीर की थी… अगर में इतिहासकार होता तो शायद बताता लोध, मंगोल, तैमूर, गुलाम, सूरी या यहां सबसे लम्बे अरसे तक राज करने वाले मुगलों नें दिल्ली को कैसे ढाला… दिल्ली की जिस बात ने मुझे आशिक बनाया है वो यही है… दिल्ली बार बार ढली है… लेकिन उसने अपनी शक्ल  बदलने नहीं दी… सीमाएं वो नहीं जो कुछ सौ साल पहले थीं… लेकिन शहर वही है… जो दिल्ली आया… वो इसे बदल नहीं पाया सिर्फ अपनी निशानी छोड़ गया… कुतुब मीनार के पास लोहे का खंबा… मस्जिद, तुगलक का किला, हुमायूं का मकबरा… जितने बादशाह उतनी दिल्ली की पहचान…

कई दोस्त हैं जो दिल्ली को पसंद नहीं करते… मुंबई उनके लिए बेहतर है… उनसे कोई शिकायत नहीं… पसंद-नापसंद बेहद निजि मामला है… मुझे दिल्ली का मिजाज़ पसंद है… और अगर आप को शहरों की महक आती हो तो आप बता सकते हैं कि दिल्ली बाकी सभी शहरों से बिल्कुल अलग है… ये महक महसूस करने के लिए सर्दियों की सुबह इंडिया गेट के आस पास किसी सड़क पर खड़े होकर चाए पीजिए… या आप सुबह 7 बजे से पहले या रात 8 बजे के बाद पुरानी दिल्ली जाइए कोने में खड़े किसी कचौड़ी वाले से ज़ायका लीजिए ये खुश्बू वहां भी मिलेगी… हां, साउथ एक्सटेंशन, ग्रेटर कैलाश में आपको ये नहीं मिलेगी… क्योंकि इस खुश्बू के लिए कई सौ साल तक पकना पड़ता है… दिल्ली पक चुकी है… दिल्ली पक रही है… एक हल्की लौ में… जिसमें धीरे धीरे स्वाद बदलता है… दिल्ली का भी बदल रहा है… अभी और बदलेगा… जब मैं बुड्ढा हो जाउंगा तब तक ये स्वाद पूरी तरह बदल चुका होगा… लेकिन मुझे भरोसा है दिल्ली ऐसी ही रहेगी… न बेहतर होगी न बदतर… मिर्ज़ा गा़लिब को कोठे पर रहने वाली उस गुमनाम तवायफ के साथ दिल्ली से भी इश्क था… उन्हें भी शायद वो बीमारी थी जिसके थोड़े बहुत लक्षण मुझमें हीं… उन्होने लिखा था… और मैं गुनगुनाता हूं…

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,

मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ…

( photo courtesy Manu Sharma )

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वरूणा से अस्सी…

अरे सर यहां तो मरते रहते हैं… लगता है यहां मरे तो स्वर्ग पक्का… उसकी बातों में मौत का गम नहीं था, जैसे मरना बनारस वालों के लिए ठीक वैसा ही है जैसे सांस लेना, अब क्या बताएं सर, हम रिक्शावाले हैं… साला हमें स्वर्ग जाना होता तो कीड़ों जैसे क्यों रेंगते। सीधे से शब्दों में जैसे उसे एक ही बार में हज़ारों साल पुराने उन तर्कों को झुठला दिया कि काशी में मरे तो मोक्ष मिलेगा, मैंने 50 रुपये में उसे पूरे दिन के लिए किया था कि बनारस घुमा दे… वैसे मुझे हिंदु धर्म, रीत, स्वर्ग, मोक्ष में नहीं किरदारों में दिलचस्पी है… किरदार जिनकी मैं फोटो उतार सकूं… पुराने शहरों में लोगों से ज़्यादा किरदार मिलते हैं… एक भिखारी जिसे पता है कि भगवान से बड़ा ब्रांड दुनिया में नहीं है… एक पानवाला जो किसी पेंटर की तरह कत्था-चूना लगाता है… एक चाटवाला जिसका अपनी दुकान में रखे पानी के बताशों से रिश्ता सा होता है, एक पंडा जिसे ये भरोसा है कि उसके हाथ से चंदन लगा तो सारे पाप कपूर बन कर उड़ जाएंगे… बड़े शहरों में भीड़ तो मिलती है किरदार नहीं मिलते… इन्हीं किरदारों की तलाश में बनारस आ गया… अरे हटो नहीं तो मर जाओगे.. जैसे ही रिक्शेवाले ने चिल्ला कर पैदल चलने वालों को हटाया जैसे मेरा ध्यान वापस आ गया… सर भूख लगी हो तो बता देना, कचौड़ी गली में बढ़िया लस्सी मिलती है… जैसे उसने बताना चाहा कि उसे भूख लगी है… मुझे भूख तो नहीं लगी थी लेकिन मैंने हामी भर दी… रिक्शा बाहर ही लगा गर मुझे वो गली के अंदर ले चला… एक दुकान के बाह खड़ा होकर मैं बनारस की पहेली जैसी गलियों को कैमरे में भरने लगा, तस्वीरें बोलती नहीं वरना गालियों की भी फोटो खींचता, बनारस जैसी गालियां कहीं नहीं सुनी…अरे सर थोड़ा बच कर, मेरी तरफ लपक कर उसने मेरा सर नीचे कर दिया, वो न करता तो पीछे से आती अर्थी मुझसे टकरा जाती… खाने पीने की गली में अर्थी देखकर मैं थोड़ा चौंक गया.. लेकिन वो और उसके जैसे सभी बाकी को कोई फर्क नहीं… कोई और शहर होता तो लोग अदब से खड़े हो जाते सर पर हाथ रख लेते, मैंने जैसे ही सर पर हाथ रखा वो हंसने लगा… अरे सर यहां ऐसे हाथ सर पर रखोगे तो खांस भी नहीं पाओगे… मौत और बेफिक्री… पहली बार साथ देख रहा था… कभी ये नज़ारा नहीं देखा था… फोटो तो खींची लेकिन उस अहसास को फोटो में भर नहीं सका… जैसे मैं एक बच्चा था, जो बड़े से मेले में आ गया था, और मेरे चारों तरफ इतने तमाशे हो रहे थे कि मैं समझ ही नहीं पाया कि किस तरफ देखूं किस तरफ को छोड़ूं… बनारस की सुबह और शाम के बीच फंसा मैं ये सोच रहा था कि ये इतनी मौत के बावजूद यहां किसी को गम नहीं… रिक्शेवाला मुझे उसी खाने-पीने वाली गली में आगे ले चला… सर ये मणिकर्णिका घाट है… इसकी कहानी तो नहीं पता, किताब में पढ़ लेना लेकिन ये सारे मुर्दे यहीं फूंके जाते हैं… कई तो साले अपने मां-बाप को यहीं छोड़ कर फरार हो जाते हैं.. जब बूढे बुढ़िया मरते हैं तो बेटा सोचता होगा कि मोक्ष मिल गया… साला किसे पता मुक्ति मिली या कुत्ते ने खा लिया… मैं उसकी बातों को अनसुना करके फोटो खींचने लगा… चिताएं, मुंडन, स्नान, पंछी, नाव, मंदिर काशी के घाट नहीं जैसे एक मॉल हो जहां धर्म से जुड़ा हर काम होता है… मैं नाव में बैठ कर दूसरी तरफ जाने की सोच ही रहा था कि जैसे वो फिर मेरे सामने कूद पड़ा… हरामी हैं साले नाव वाले 200 से एक रुपया ज़्यादा मत देना सर, अब 200 तो बनता है बेचारा इतने हाथ पांव मारेगा… मैं नाव में बैठ कर फोटो खींचने लगा और वो मल्लाह से पता नहीं क्या बात कर रहा था… कितना बोलता है ये रिक्शेवाला… दो मिनट चुप हो जाए तो मैं शांति से अपना काम करूं… मैंने खुद को मीठा बनाते हुए कहा… यार दो मिनट चुप हो जाओ मैं थोड़ा काम कर लूं… उसके चेहरे से ज़ाहिर था कि उसे ये बात अच्छी नहीं लगी… उसके बाद वो कुछ नहीं बोला… शाम तक मेरे साथ रहा लेकिन कुछ खास बोला नहीं… बीच बीच में कुछ बड़बड़ाता लेकिन जैसे उसे ध्यान हो जाता कि मुझे ज़्यादा बोलना पसंद नहीं तो चुप हो जाता… शाम को दशाश्वमेघ घाट के पास मुझे छोड़ते हुए बोला… सर कल भी बनारस घूमना हो तो बता देना.. मैं होटल आ जाउंगा… कुछ बोलूंगा नहीं… आपको एक ऐसी चीज़ खिलाउंगा जो सिर्फ सर्दियों में मिलती है.. लेकिन मैं जैसे इस रिश्ते को बढ़ाना नहीं चाहता था.. मैंने कहा.. नहीं कल ज़रूरत नहीं है… वो मुंह लटकाए चला गया… होगा कोई मुझे क्या… शाम को मैंने गंगा आरती की तस्वीरें लीं… रौशनी… धर्म… अध्यात्म… वो जैसे कोई और दुनिया थी… वहां देखकर लगता ही नहीं था कि थोड़ी ही दूर ऐसी ही आग चिताओं को जला रही है… ये मेल दुनिया में कहीं नहीं था… मौत का अंधेरा और पूजा की चकाचौंध… तस्वीरें लेकर मैं लौट आया… रात को होटल में मैं सोच रहा था कि एक बार फिर मणिकर्णिका घाट जाना चाहिए… सुना है वहां उसी अग्नि से चिता को मुखाग्नि दी जाती है जो हज़ारों साल से जल रही है… इस बार कचौड़ी गली में मैंने हर चीज़ का स्वाद भी चखा, कचौड़ी, लस्सी औऱ हर वो चीज़ जिसके बारे में इंटरनेट पर लिखा था… लेकिन आज वो बक बक नहीं थी तो राहत मिली… अर्थियां मेरे पास से गुज़र रहीं थीं और खुद को बेफिक्र दिखाने का नाटक करता मैं घूम रहा था… आज शांति लग रही थी… अच्छा लग रहा था…राम नाम सत्य है… बीच बीच में सुनाई देता मैं कभी सुनता कभी अनसुना कर देता… इधर उधर मंदिरों की फोटो खींचते खींचते जैसे ही घाट पर पहुंचा शांति सन्नाटे में बदल गई… टूटी फूटी अर्थी पर उसी रिक्शेवाले की लाश पड़ी थी… मैं पसीना पसीना हो गया… पास खड़े एक आदमी से पूछा तो उसने बताया कोई ट्रक रात को टक्कर मार गया… उसकी आवाज़ जैसे मेरे मन में गूंजी… मोक्ष मिलना होता तो कीड़ों जैसे पैदा क्यों होते… मैं तुरंत पलट कर वहां से निकल गया… सीधा होटल रुका आ कर… सिर्फ एक बात मन में आई… काश काशी में सबको मोक्ष मिलता हो…

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Sachin it was, a world cup that wasn’t…

india is a country of drama and  extravagance of emotion, be it a family function or political theater, india’s always produced drama, be it our religious scriptures or our very own bollywood movies, dialogues-counter dialogues had made our life far more entertaining than anyone else’s in the world, same is with our sports, be it football in bengal, or hockey in punjab, they drive emotions, pakistan is not different either, and when we talk abt india-pakistan sports we must not forget the cricketing rivalry of both the teams…   players, coaches and even umpires made india-pakistan cricket look greater than any sport. there are so many instances of prodigy overtaking a giant, bit like david and the goliath, something similar happened between two cricketers, one was a prodigy then n the other was stalward, and i am lucky to hear it from one of the man of this classical yet respectful spat. Sachin Tendulkar was a kid who was center of discussions of cricket expert around the world, and on the other hand there was Abdul Qadir, the master of tweak bowling who was our guest during 2007 cricket world cup… his deadly googlies got better of the best those days and sachin was one of promising kids of that time… i head this story from Abdul Qadir, certainly he was not very happy telling this story but he made every effort to take some pride in this piece of history.

sachin was part of the cricket team that was visiting pakistan in winters of 89, he was the youngest of lad who was going to wear a test cap, and there was a friendly ( i wonder this exist between india and pakistan) match, qadir was bowling in beautiful rhythm and he’d already heard about sachin’s rare talent, when sachin was to face his first ball qadir asked him if you are really something like people say step out and try hitting me, it was a ploy, a cunning effort to tempt a little kid with a candy, the kid took the chance and grabbed the candy ( it was six) again qadir asked that boy to step out again if he has the courage ( second ploy) he came out on ball went into the stands, n he repeated it again later, it became the last match for Qadir and first shot of fame to sachin, while telling this story qadir maintained that he was encouraging sachin so that he can make a big name by hitting the best spinner of that time, but i don’t think he was saying truth, it was amazing to hear it from his mouth, with his full punjabi accent there was a man who was telling me story of his downfall, story of the last nail in his coffin still because it was sachin he took pride in it, thats sachin…  and this was the only good memory i have of 2007 Cricket World Cup

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that was yesterday…

It was the year 2003, I was a reporter and was going through a very difficult time, i had my stories going down, i had my stories being leaked to other journalists, and so much, was lowest in confidence and was struggling to focus, 14 February was coming and i was short of story ideas, my bureau chief who supported me alot in my career asked me, what will you do for V day, i said, sir, was thinking of doing a special report on flower market that   takes place in the center of Delhi just for few hours… he agreed and cautioned, the story should be beautiful, my confidence was so low that i couldn’t even nod my head, came out of his cabin and sat quite, i didn’t knew what to do, but fortunately i was working with some of the world’s best camera-persons… one of them was Ravi, amazing man and extraordinary cameraman, i asked him would he be doing a story on flower market, he agreed and gave me a beautiful smile which boosted my career, few of my other colleagues were planning a V day party they invited me but i was not in a frame to attend such party, doing a story was my only focus on V day… we both stayed awake whole night, Ravi kept shooting and captured one of the most beautiful shots of flower i’ve ever seen, at 6 AM the market was closed and we were very happy when we came back… i had one of the most beautiful shots of flowers and I had a lovely script in my hand by the time i came back to the office, but my bad luck got better of me, when i tried digitizing the tape the tape got so damaged that it was of no use, my story, my day and my V day was spoiled, it was tired… tired of fighting my luck it was the time when my then friends played a song for me… the song was Kyun Chatli hai Pawan, and suddenly the depression was gone, i was feeling better, and, from that day whenever someone talks about february 14, this song starts in my mind… na tum jano na hum… but.. that was yesterday…

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