पूड़ी…

ऐ बुढ़िया… दिखाई नहीं देता… रणछोड़ चीखा… भीड़ भरी सड़क पर किसी विधवा आश्रम से निकली वो बुढ़िया सहम कर वहीं ठिठक गई… न सड़क के पार गई और न ही वापस जा पाई… नई मोटरसाइकिल में रणछोड़ ने ब्रेक लगाया तो वो सफेद कपड़ों वाली बाल कटवाए हुए बुढ़िया के पास जाकर रुक गई… क्या री अम्मा… तेरे को दिखाई नहीं देता सड़क कैसे पार करते हैं… बुढ़िया अचानक सामने आई मोटरसाइकिल… उसके ब्रेक की तेज़ आवाज़ और रणछोड़ के चिल्लाने से जैसे छोटे से कोमा में चली गई हो… अरे यार… यहां विधवाएं इतनी बढ़ गईं हैं कि पत्थर भी फेंको तो कम से कम दो बुढ्डियों के लगेगा… तुम विदेश से आए हो ना… तुम्हें तो पता होगा… वहां भी तो होता है ना ओल्ड ऐज होम… रिटायरमेंट होम कहते हैं वहां पर.. मैंने बात काट कर कहा.. अरे यार… गुलाब को गुलाब नहीं कहेगा… शेक्सपियर का सदियों पुराना जुमला सुनाते सुनाते वो हंसने लगा… मुझे समझ नहीं आया कि मैं हंसूं या नहीं… मेरे सामने उसी बुढ़िया की शक्ल घूम रही थी… किसने छोड़ा होगा उसे… उसके बच्चे होंगे या नहीं… विधवा होने के पाप में उसकी कितनी हिस्सेदारी होगी… रणछोड़ ने बाइक रोकी और कहा.. सुन तेरे को लस्सी पिलाता हूं… कल्लू की दुकान पर कल्लू तो मर गया उसका लौंडा बनाता है… साला इंडिया से ज़्यादा विदेश में मशहूर है.. इंटरनेट पर छाया रहता है… कोई तो बोल रहा था कि विदेश में दुकान भी खोलना चाहता है… रणछोड़ और भी न जाने क्या क्या बोल रहा था… लेकिन मैं उस बुढ़िया से आगे ही नहीं बढ़ पाया… कांपती… छोटी सी… तन पर बंधी सफेद साड़ी का सिरा सर पर भी था… दुनिया ने भले ही उसे छोड़ दिया हो वो दुनिया को नहीं छोड़ पाई थी शायद… झोला खाली था… मंडी के बाहर ही थी… गरीब तो थी ही भूखी भी थी… वरना ऐसे कांप कांप कर कोई नहीं चलता… मैं जैसे उस लम्हे से बाहर ही नहीं निकल पा रहा था… और रणछोड़ ने कब मुझे लस्सी का ग्लास थमा दिया पता ही नहीं चला… रणछोड़… कृष्ण का ही नाम… मथुरा में हर शख्स.. हर चीज़ जैसे कृष्ण से जुड़ी हुई थी… कृष्ण…यहीं उन्हें दूसरी मां का प्यार मिला जिसकी मिसाल आज तक दुनिया देती है…शायद उस बुढ़िया ने भी अपने बेटे को वैसा ही प्यार दिया होगा… या शायद नहीं… उलझन थी कोई मां से कैसे ऐसा कर सकता है… रणछोड़ से शिकायत नहीं थी… वो उसकी मां तो थी नहीं… सो जानवर जैसा व्यवहार किया भी तो क्या… अचानक रणछोड़ चिल्लाया… अरे वो पूड़ी निकाल जल्दी से जो अम्मा ने दी थी… गऊ माता वो रही.. न जाने गाय कहां गईं आज कल.. अच्छा है यहीं मिल गईं वरना कितना घूमना पड़ता… जय गऊ माता कहते कहते उसने सारी पूड़ियां गाय को खिला दीं… बस एक नीचे गिर गई…मैंने दुआ मांगी काश वो बुढ़िया भी इधर होती तो अपने हिस्सा का पुण्य मैं भी बटोर लेता…

Advertisements

Leave a comment

Filed under Uncategorized

Dilli se…

एक शेर है,

हज़ारों बार ज़माना इधर से गुज़रा है,

नई नई सी है तेरी रहगुज़र फिर भी

लोगों ने अपने माशूक के लिए इस शेर को कई बार कहा होगा, इश्क, रोमांस, उल्फत, स्नेह… अमूमन माशूक से जोड़े जाते हैं… या उस शहर से जिसमें माशूक रहता हो…

कोई दोस्त है न रक़ीब है

तेरा शहर कितना अजीब है…

लेकिन ज़रूरी नहीं रोमांस किसी इंसान से ही किया जाए… खुदा से किया जाए तो कोई मीरा सी दीवानी नज़र आती है… बच्चे से किया जाए तो यशोदा सी मां… मुझे इस शहर से इश्क है… ये शहर जो दिल्ली है… मैं इतिहासकार होता तो बता देता कि कैसे इंद्रप्रस्थ ने महाभारत की ऐतिहासिक लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई… या बता देता कि शहर के आखिर हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान का वक्त कैसा था… या कुतुबुद्दीन ऐबक ने क्या सोच कर इस्लाम की धुरी की तर्ज़ पर कुतुब मीनार तामीर की थी… अगर में इतिहासकार होता तो शायद बताता लोध, मंगोल, तैमूर, गुलाम, सूरी या यहां सबसे लम्बे अरसे तक राज करने वाले मुगलों नें दिल्ली को कैसे ढाला… दिल्ली की जिस बात ने मुझे आशिक बनाया है वो यही है… दिल्ली बार बार ढली है… लेकिन उसने अपनी शक्ल  बदलने नहीं दी… सीमाएं वो नहीं जो कुछ सौ साल पहले थीं… लेकिन शहर वही है… जो दिल्ली आया… वो इसे बदल नहीं पाया सिर्फ अपनी निशानी छोड़ गया… कुतुब मीनार के पास लोहे का खंबा… मस्जिद, तुगलक का किला, हुमायूं का मकबरा… जितने बादशाह उतनी दिल्ली की पहचान…

कई दोस्त हैं जो दिल्ली को पसंद नहीं करते… मुंबई उनके लिए बेहतर है… उनसे कोई शिकायत नहीं… पसंद-नापसंद बेहद निजि मामला है… मुझे दिल्ली का मिजाज़ पसंद है… और अगर आप को शहरों की महक आती हो तो आप बता सकते हैं कि दिल्ली बाकी सभी शहरों से बिल्कुल अलग है… ये महक महसूस करने के लिए सर्दियों की सुबह इंडिया गेट के आस पास किसी सड़क पर खड़े होकर चाए पीजिए… या आप सुबह 7 बजे से पहले या रात 8 बजे के बाद पुरानी दिल्ली जाइए कोने में खड़े किसी कचौड़ी वाले से ज़ायका लीजिए ये खुश्बू वहां भी मिलेगी… हां, साउथ एक्सटेंशन, ग्रेटर कैलाश में आपको ये नहीं मिलेगी… क्योंकि इस खुश्बू के लिए कई सौ साल तक पकना पड़ता है… दिल्ली पक चुकी है… दिल्ली पक रही है… एक हल्की लौ में… जिसमें धीरे धीरे स्वाद बदलता है… दिल्ली का भी बदल रहा है… अभी और बदलेगा… जब मैं बुड्ढा हो जाउंगा तब तक ये स्वाद पूरी तरह बदल चुका होगा… लेकिन मुझे भरोसा है दिल्ली ऐसी ही रहेगी… न बेहतर होगी न बदतर… मिर्ज़ा गा़लिब को कोठे पर रहने वाली उस गुमनाम तवायफ के साथ दिल्ली से भी इश्क था… उन्हें भी शायद वो बीमारी थी जिसके थोड़े बहुत लक्षण मुझमें हीं… उन्होने लिखा था… और मैं गुनगुनाता हूं…

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,

मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ…

( photo courtesy Manu Sharma )

4 Comments

Filed under Here and there..., Uncategorized

वरूणा से अस्सी…

अरे सर यहां तो मरते रहते हैं… लगता है यहां मरे तो स्वर्ग पक्का… उसकी बातों में मौत का गम नहीं था, जैसे मरना बनारस वालों के लिए ठीक वैसा ही है जैसे सांस लेना, अब क्या बताएं सर, हम रिक्शावाले हैं… साला हमें स्वर्ग जाना होता तो कीड़ों जैसे क्यों रेंगते। सीधे से शब्दों में जैसे उसे एक ही बार में हज़ारों साल पुराने उन तर्कों को झुठला दिया कि काशी में मरे तो मोक्ष मिलेगा, मैंने 50 रुपये में उसे पूरे दिन के लिए किया था कि बनारस घुमा दे… वैसे मुझे हिंदु धर्म, रीत, स्वर्ग, मोक्ष में नहीं किरदारों में दिलचस्पी है… किरदार जिनकी मैं फोटो उतार सकूं… पुराने शहरों में लोगों से ज़्यादा किरदार मिलते हैं… एक भिखारी जिसे पता है कि भगवान से बड़ा ब्रांड दुनिया में नहीं है… एक पानवाला जो किसी पेंटर की तरह कत्था-चूना लगाता है… एक चाटवाला जिसका अपनी दुकान में रखे पानी के बताशों से रिश्ता सा होता है, एक पंडा जिसे ये भरोसा है कि उसके हाथ से चंदन लगा तो सारे पाप कपूर बन कर उड़ जाएंगे… बड़े शहरों में भीड़ तो मिलती है किरदार नहीं मिलते… इन्हीं किरदारों की तलाश में बनारस आ गया… अरे हटो नहीं तो मर जाओगे.. जैसे ही रिक्शेवाले ने चिल्ला कर पैदल चलने वालों को हटाया जैसे मेरा ध्यान वापस आ गया… सर भूख लगी हो तो बता देना, कचौड़ी गली में बढ़िया लस्सी मिलती है… जैसे उसने बताना चाहा कि उसे भूख लगी है… मुझे भूख तो नहीं लगी थी लेकिन मैंने हामी भर दी… रिक्शा बाहर ही लगा गर मुझे वो गली के अंदर ले चला… एक दुकान के बाह खड़ा होकर मैं बनारस की पहेली जैसी गलियों को कैमरे में भरने लगा, तस्वीरें बोलती नहीं वरना गालियों की भी फोटो खींचता, बनारस जैसी गालियां कहीं नहीं सुनी…अरे सर थोड़ा बच कर, मेरी तरफ लपक कर उसने मेरा सर नीचे कर दिया, वो न करता तो पीछे से आती अर्थी मुझसे टकरा जाती… खाने पीने की गली में अर्थी देखकर मैं थोड़ा चौंक गया.. लेकिन वो और उसके जैसे सभी बाकी को कोई फर्क नहीं… कोई और शहर होता तो लोग अदब से खड़े हो जाते सर पर हाथ रख लेते, मैंने जैसे ही सर पर हाथ रखा वो हंसने लगा… अरे सर यहां ऐसे हाथ सर पर रखोगे तो खांस भी नहीं पाओगे… मौत और बेफिक्री… पहली बार साथ देख रहा था… कभी ये नज़ारा नहीं देखा था… फोटो तो खींची लेकिन उस अहसास को फोटो में भर नहीं सका… जैसे मैं एक बच्चा था, जो बड़े से मेले में आ गया था, और मेरे चारों तरफ इतने तमाशे हो रहे थे कि मैं समझ ही नहीं पाया कि किस तरफ देखूं किस तरफ को छोड़ूं… बनारस की सुबह और शाम के बीच फंसा मैं ये सोच रहा था कि ये इतनी मौत के बावजूद यहां किसी को गम नहीं… रिक्शेवाला मुझे उसी खाने-पीने वाली गली में आगे ले चला… सर ये मणिकर्णिका घाट है… इसकी कहानी तो नहीं पता, किताब में पढ़ लेना लेकिन ये सारे मुर्दे यहीं फूंके जाते हैं… कई तो साले अपने मां-बाप को यहीं छोड़ कर फरार हो जाते हैं.. जब बूढे बुढ़िया मरते हैं तो बेटा सोचता होगा कि मोक्ष मिल गया… साला किसे पता मुक्ति मिली या कुत्ते ने खा लिया… मैं उसकी बातों को अनसुना करके फोटो खींचने लगा… चिताएं, मुंडन, स्नान, पंछी, नाव, मंदिर काशी के घाट नहीं जैसे एक मॉल हो जहां धर्म से जुड़ा हर काम होता है… मैं नाव में बैठ कर दूसरी तरफ जाने की सोच ही रहा था कि जैसे वो फिर मेरे सामने कूद पड़ा… हरामी हैं साले नाव वाले 200 से एक रुपया ज़्यादा मत देना सर, अब 200 तो बनता है बेचारा इतने हाथ पांव मारेगा… मैं नाव में बैठ कर फोटो खींचने लगा और वो मल्लाह से पता नहीं क्या बात कर रहा था… कितना बोलता है ये रिक्शेवाला… दो मिनट चुप हो जाए तो मैं शांति से अपना काम करूं… मैंने खुद को मीठा बनाते हुए कहा… यार दो मिनट चुप हो जाओ मैं थोड़ा काम कर लूं… उसके चेहरे से ज़ाहिर था कि उसे ये बात अच्छी नहीं लगी… उसके बाद वो कुछ नहीं बोला… शाम तक मेरे साथ रहा लेकिन कुछ खास बोला नहीं… बीच बीच में कुछ बड़बड़ाता लेकिन जैसे उसे ध्यान हो जाता कि मुझे ज़्यादा बोलना पसंद नहीं तो चुप हो जाता… शाम को दशाश्वमेघ घाट के पास मुझे छोड़ते हुए बोला… सर कल भी बनारस घूमना हो तो बता देना.. मैं होटल आ जाउंगा… कुछ बोलूंगा नहीं… आपको एक ऐसी चीज़ खिलाउंगा जो सिर्फ सर्दियों में मिलती है.. लेकिन मैं जैसे इस रिश्ते को बढ़ाना नहीं चाहता था.. मैंने कहा.. नहीं कल ज़रूरत नहीं है… वो मुंह लटकाए चला गया… होगा कोई मुझे क्या… शाम को मैंने गंगा आरती की तस्वीरें लीं… रौशनी… धर्म… अध्यात्म… वो जैसे कोई और दुनिया थी… वहां देखकर लगता ही नहीं था कि थोड़ी ही दूर ऐसी ही आग चिताओं को जला रही है… ये मेल दुनिया में कहीं नहीं था… मौत का अंधेरा और पूजा की चकाचौंध… तस्वीरें लेकर मैं लौट आया… रात को होटल में मैं सोच रहा था कि एक बार फिर मणिकर्णिका घाट जाना चाहिए… सुना है वहां उसी अग्नि से चिता को मुखाग्नि दी जाती है जो हज़ारों साल से जल रही है… इस बार कचौड़ी गली में मैंने हर चीज़ का स्वाद भी चखा, कचौड़ी, लस्सी औऱ हर वो चीज़ जिसके बारे में इंटरनेट पर लिखा था… लेकिन आज वो बक बक नहीं थी तो राहत मिली… अर्थियां मेरे पास से गुज़र रहीं थीं और खुद को बेफिक्र दिखाने का नाटक करता मैं घूम रहा था… आज शांति लग रही थी… अच्छा लग रहा था…राम नाम सत्य है… बीच बीच में सुनाई देता मैं कभी सुनता कभी अनसुना कर देता… इधर उधर मंदिरों की फोटो खींचते खींचते जैसे ही घाट पर पहुंचा शांति सन्नाटे में बदल गई… टूटी फूटी अर्थी पर उसी रिक्शेवाले की लाश पड़ी थी… मैं पसीना पसीना हो गया… पास खड़े एक आदमी से पूछा तो उसने बताया कोई ट्रक रात को टक्कर मार गया… उसकी आवाज़ जैसे मेरे मन में गूंजी… मोक्ष मिलना होता तो कीड़ों जैसे पैदा क्यों होते… मैं तुरंत पलट कर वहां से निकल गया… सीधा होटल रुका आ कर… सिर्फ एक बात मन में आई… काश काशी में सबको मोक्ष मिलता हो…

5 Comments

Filed under Uncategorized

Sachin it was, a world cup that wasn’t…

india is a country of drama and  extravagance of emotion, be it a family function or political theater, india’s always produced drama, be it our religious scriptures or our very own bollywood movies, dialogues-counter dialogues had made our life far more entertaining than anyone else’s in the world, same is with our sports, be it football in bengal, or hockey in punjab, they drive emotions, pakistan is not different either, and when we talk abt india-pakistan sports we must not forget the cricketing rivalry of both the teams…   players, coaches and even umpires made india-pakistan cricket look greater than any sport. there are so many instances of prodigy overtaking a giant, bit like david and the goliath, something similar happened between two cricketers, one was a prodigy then n the other was stalward, and i am lucky to hear it from one of the man of this classical yet respectful spat. Sachin Tendulkar was a kid who was center of discussions of cricket expert around the world, and on the other hand there was Abdul Qadir, the master of tweak bowling who was our guest during 2007 cricket world cup… his deadly googlies got better of the best those days and sachin was one of promising kids of that time… i head this story from Abdul Qadir, certainly he was not very happy telling this story but he made every effort to take some pride in this piece of history.

sachin was part of the cricket team that was visiting pakistan in winters of 89, he was the youngest of lad who was going to wear a test cap, and there was a friendly ( i wonder this exist between india and pakistan) match, qadir was bowling in beautiful rhythm and he’d already heard about sachin’s rare talent, when sachin was to face his first ball qadir asked him if you are really something like people say step out and try hitting me, it was a ploy, a cunning effort to tempt a little kid with a candy, the kid took the chance and grabbed the candy ( it was six) again qadir asked that boy to step out again if he has the courage ( second ploy) he came out on ball went into the stands, n he repeated it again later, it became the last match for Qadir and first shot of fame to sachin, while telling this story qadir maintained that he was encouraging sachin so that he can make a big name by hitting the best spinner of that time, but i don’t think he was saying truth, it was amazing to hear it from his mouth, with his full punjabi accent there was a man who was telling me story of his downfall, story of the last nail in his coffin still because it was sachin he took pride in it, thats sachin…  and this was the only good memory i have of 2007 Cricket World Cup

Leave a comment

Filed under Just in sports

that was yesterday…

It was the year 2003, I was a reporter and was going through a very difficult time, i had my stories going down, i had my stories being leaked to other journalists, and so much, was lowest in confidence and was struggling to focus, 14 February was coming and i was short of story ideas, my bureau chief who supported me alot in my career asked me, what will you do for V day, i said, sir, was thinking of doing a special report on flower market that   takes place in the center of Delhi just for few hours… he agreed and cautioned, the story should be beautiful, my confidence was so low that i couldn’t even nod my head, came out of his cabin and sat quite, i didn’t knew what to do, but fortunately i was working with some of the world’s best camera-persons… one of them was Ravi, amazing man and extraordinary cameraman, i asked him would he be doing a story on flower market, he agreed and gave me a beautiful smile which boosted my career, few of my other colleagues were planning a V day party they invited me but i was not in a frame to attend such party, doing a story was my only focus on V day… we both stayed awake whole night, Ravi kept shooting and captured one of the most beautiful shots of flower i’ve ever seen, at 6 AM the market was closed and we were very happy when we came back… i had one of the most beautiful shots of flowers and I had a lovely script in my hand by the time i came back to the office, but my bad luck got better of me, when i tried digitizing the tape the tape got so damaged that it was of no use, my story, my day and my V day was spoiled, it was tired… tired of fighting my luck it was the time when my then friends played a song for me… the song was Kyun Chatli hai Pawan, and suddenly the depression was gone, i was feeling better, and, from that day whenever someone talks about february 14, this song starts in my mind… na tum jano na hum… but.. that was yesterday…

1 Comment

Filed under Here and there...

dilli

forget the beautiful smell of morning in delhi, forget the pleasure of watching century old monuments in sunshine of winters… forget sitting under Jamun tree in summers… forget it.. because it is time to forget the past and act now… the city is suffering from a disease, a disease called superiority complex, and state of denial is making it worse, Delhi can feel fortunate of being multiple power center, A Central government, state government and local bodies but interestingly they are are acting against delhi. actually the delhi has many cities in it, it basically is a small india, and since last 20 years it is the perfect reflection of how country is being governed, political governments came they build concrete jungle and now they claim they’ve built a perfect city to be in, which infact is the case, with every inch of concrete the city’s paid with the culture as the price… i am not sad about the state of delhi, rather disappointed… this is city is run by the people who are not connected with it even remotely. the chief minister, the prime minister and even local bodies, they’ve all gave only one thing to this city a superiority complex, much like moughals and nawabs who were in denial state till they extinct…

 

we have multiple powers roaming on road in city, someone is someone of someone, so the other one doesn’t like it and try to take frustration out on someone else as a result he does something else to someone and thus someone pays the price for being no one… this is the story of delhi in last 20 years… who rules the city is the big question, the chief minister doesn’t.. and its quite evident when she asks journalists to pray for good commonwealth games, she surely is wrong person at the right place, she doesn’t deserve to serve… and to add she has lot of relatives walking on roads working for her… her daughter beats up a lawyer on road.. her son is an MP and claims to be the youth face of her party though he is more older than any youth.. he denies of being old.. even CM calls herself youth.. this is the perfect example for state of denial…

 

The police is more concerned of what people say on Facebook rather what is the reality… and to add they’ve decided to make police stations look more beautiful… look beautiful.. and they’ve did least to work beautiful… MCD… decided to come on facebook and suddenly decided to take complaints of garbage only… Prime Minister doesn’t care for the city outside lutyens zone and his coalition government.. the youth faces of all the political parties are more concerned on putting they posters on the walls of city…

 

and this city is suffering.. suffocation and slowly dying… same way the mumbai died in 40s and 50s.. the bangalore dies in 90s and many other cities are choosing to die… i feel like a small child looking at his most lovable grandmother dying infront of his eyes… she told her many stories… she gave her good values.. but now she can not withstand pollution… so she is dying.. but not in peace.. the grandson is helpless…

1 Comment

Filed under Uncategorized

Delhi

 



Delhi doesn’t owe me anything, as the matter of fact i don’t owe anything to city as well… i live in delhi, and i am sure i can live in other cities as well…. like my friends.. living all over india… all over world, still Delhi mesmerises me… and infact it mesmerises me more everyday, and i know I am not alone in the romance with Delhi… Raghu Rai, William Dalrymple and many more have fall into the lap of delhi and could never got up…

The delhi which we see today, broad raods, metro, low floor buses, and the amazing Ridge area is not the delhi i have fascination with, its something else which lives beyond that, a magic that stops everyday as soon as first metro starts picking up school kids and working people around the city, the joy of Delhi is not on broad roads or numerous fly-overs but instead in narrow lanes or Delhi, feel Delhi, on service lanes of Connaught place, at around 5 or 6 am you will feel that city is waking up for a new start and literally everyday… smell the city on the next morning of Diwali… you will feel the festival in the air… or morning of Holi… nobody will ask you to pick gulal, yet you will find yourself like a little kid wanting to color whole city…

Delhi’s mughal character is still intact… not near malls and (picture) halls… delhi people take pride in the city… not long ago Delhi was like a big joint family, if you bunk your school you were sure news of you watching movie in theater will reach your home much before you reach, a big family big joint family, many of the cities of India have moved ahead from the word Join Family, it is time of nuclear family, smaller the family more freedom assured, part of delhi still believe in living in the age of joint family where all the members do their part to run a big family of many members, delhi’s biggest enemy has been crime against women, but again this has to be looked into more honest manner… as stats and experience suggest almost 90% of the crime against women happen from someone who is known to the girl… and rest happens when delhi attracts more people every day from neighboring states… recent case of Mangolpuri rape case we saw criminals were from outside of delhi or in most of the other cases the victim was familiar with the  ‘criminal’ now how is one suppose to stop enemy within, still go to purani dilli  in the night you will see good families with women and children having magaj bhurji at Al-Jawahar at Jama Masjid, I am not justifying crimes but we need to have honest look at it.

Delhi is frank, honest yet not blunt to people while cities like Bangalore, Mumbai are mostly inhuman in nature, i know someone from mumbai and he told me this incident, he used to live in a home and one night he came back very late in the morning he hear the cries of the family he was paying rent to, he came to know the landlord passed away, he said i was very tired so i just closed my eyes and did not get up, this scares me… delhi on the other hand gives respect, still i see people standing and putting their hand on head when they see dead body passing, they feel connect with each other which sadly is eroding every day, every hour and now every minute, i am aware soon Delhi will not be Delhi anymore, but till this happens let Delhi be Delhi… lets celebrate delhi… lets thank Delhi for giving us best shape of Urdu and much more which i wont be able to discover in one life time…

1 Comment

Filed under Here and there...